नई दिल्ली। हिंदी दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए भारत की भाषाई विविधता को राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं है, बल्कि अलग-अलग भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है।

अमित शाह ने कहा कि भारत में बोली जाने वाली प्रत्येक भाषा अपने साथ समृद्ध इतिहास, लोक परंपराएं, संस्कृति और दुनिया को देखने का विशिष्ट दृष्टिकोण लेकर चलती है। देश की सभी भाषाएं मिलकर नई पीढ़ी के संस्कारों और मूल्यों को आकार देती हैं। यही भाषाई विविधता भारत की ‘विविधता में एकता’ की भावना को और अधिक मजबूत बनाती है।

हिंदी का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा नहीं, संवाद बढ़ाना

केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि हिंदी का उद्देश्य दूसरी भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा करना नहीं है। हिंदी देश के अलग-अलग हिस्सों और भाषाई समुदायों के बीच सार्थक संवाद का माध्यम बनकर राष्ट्रीय एकता को मजबूती प्रदान करती है।

उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि अलग-अलग मातृभाषाओं से जुड़े लोगों ने हिंदी को व्यापक जनसंवाद की भाषा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी का विस्तार केवल हिंदी भाषी लोगों के प्रयासों से नहीं, बल्कि देश की विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े महापुरुषों के योगदान से हुआ है।

दुनिया की भाषाएं सीखें, मातृभाषा को न भूलें

अमित शाह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे दुनिया की अधिक से अधिक भाषाएं सीखें, लेकिन अपनी मातृभाषा को कभी न छोड़ें। उन्होंने अभिभावकों से भी बच्चों के साथ मातृभाषा में संवाद करने की अपील की।

उन्होंने कहा कि अपनी भाषा बोलने में किसी को हीन भावना का अनुभव नहीं करना चाहिए। मातृभाषा व्यक्ति को उसकी मां, मिट्टी, इतिहास, परंपराओं और संस्कृति से जोड़ती है। भारतीय भाषाओं का सम्मान केवल भाषा का विषय नहीं, बल्कि देश के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव से जुड़ा प्रश्न है।

14 सितंबर 1949 को हिंदी बनी संघ की राजभाषा

अमित शाह ने कहा कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। आजादी के बाद हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं ने राष्ट्र निर्माण, प्रशासन, विकास योजनाओं और सरकारी नीतियों को आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के ‘औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति’ के आह्वान का उल्लेख करते हुए कहा कि इस दिशा में भारतीय भाषाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किए जाने और नए कानूनों के निर्माण को उन्होंने भारतीय आत्मसम्मान से जुड़ा कदम बताया।

मेरी मातृभाषा गुजराती, हिंदी जोड़ती है देशवासियों से

अपनी मातृभाषा का उल्लेख करते हुए अमित शाह ने कहा कि उनकी मातृभाषा गुजराती है, लेकिन जब वह देश के किसी भी हिस्से में जाते हैं तो हिंदी उन्हें आम लोगों से सीधे जुड़ने में मदद करती है।

उन्होंने कहा कि हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन, जनजागरण और राष्ट्रीय एकता की भावना को जन-जन तक पहुंचाया। भारतीय भाषाओं को उचित सम्मान देना देश की संस्कृति, इतिहास और आत्मगौरव को सम्मान देने के समान है।

दयानंद सरस्वती ने हिंदी में लिखा ‘सत्यार्थ प्रकाश’

अमित शाह ने स्वामी दयानंद सरस्वती का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी मातृभाषा गुजराती थी, फिर भी उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी में लिखी। यह इस बात का प्रमाण है कि हिंदी को समृद्ध बनाने में गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है।

गांधी ने की थी दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना

गृह मंत्री ने महात्मा गांधी के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने वर्ष 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना और देश के अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों के बीच संवाद को मजबूत करना था।

सुभाष चंद्र बोस ने हिंदी को बनाया संवाद का माध्यम

अमित शाह ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी मातृभाषा बंगाली थी, लेकिन उन्होंने आजाद हिंद फौज में आपसी संवाद के लिए हिंदी को अपनाया। नेताजी ने देश को ‘जय हिंद’ जैसा प्रेरणादायी और राष्ट्रीय एकता से ओत-प्रोत नारा दिया।

गृह मंत्री ने कहा कि अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक महापुरुषों ने हिंदी को जनसंचार और राष्ट्रीय संवाद की भाषा के रूप में मजबूत किया। जिन महापुरुषों की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, उनका हिंदी के विकास में योगदान आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।